Saturday, December 20, 2008

अलुम्नी मीट - रजत जयंती (29-30 Nov 2008)

जैसे एक पतंगे का सम्मोहन, देख जलता हुआ दिया।
विरहिणी के लिए जैसे उसका, बिछड़ा हुआ पिया।
किसी युद्धबंदी सैनिक ने जैसे, अपना वतन पा लिया।
वैसे ही हम भूतपूर्व छात्रों के लिए, होता ये मालविया।

मित्रों के संग घूम टहल कर, गन्ना अमरुद उड़ाते थे।
गोलघर में तितलियों के पीछे, लम्बी रेस लगाते थे।
कुछ को खोराबार के सूने जंगल ही, ज्यादा रास आते थे।
ढाबे में इतना खा गए, कि मुंशी बाबूलाल, पैरों में गिर जाते थे।

रेलवे कंसेसन पर डीन के ठप्पे, हास्टल में ही लग जाते थे।
रेल यात्रा में सारे माल्वियन, केवल हरिजन कहलाते थे।
साथी दोस्त के लिए झगडा कर, अपना सर भी फुड़वाते थे।
पास होने पर उस दोस्त से दुबारा, शायद ही कभी मिल पाते थे।
निर्दयी वार्डेन सर्द रातों में, हमारा हीटर उठा ले जाते थे।
परीक्षा टलवाने के लिए हम भी, प्रिंसिपल तक को हड़काते थे।

रजत जयंती पर मालविया में, करेंगे जबरदस्त धमाल।
पुराने दोस्त वही सारे, जो पहले मिल करते थे बवाल।
जो नहीं आ पाएँगे, सारी जिंदगी उनको रहेगा ये मलाल।
अब जीने से क्या फ़ायदा ईश्वर, कर दे तू मुझको हलाल।

चार यार मिल जायें तो, अमिताभ की रात हो गुलजार।
क्या होगा नजारा जब, इकट्ठे होंगे एक सौ चार दिलदार।
असमान रश्क करेगा जब, कैम्पस में खिलेंगे हम दमदार।
बिल गेट्स भी नहीं दिखेगा तब, हमसे ज्यादा मालदार।

कह डी के कविराय, भला हो दुनिया के रखवाले।
एक ही झटके में तूने, इतने बिछड़े यार दे डाले।
दुबई की चकाचौंध क्या, तोड़ भागूं इंद्रलोक के ताले।
मिल जाय अगर बिछड़े यार संग, जाम के चंद प्याले।

Wednesday, December 17, 2008

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